Osho Kon The ? ओशो किस जाति के थे? ओशो का इतिहास क्या है?

यह ब्लॉग पोस्ट आपको ओशो (रजनीश) के रहस्यमयी जीवन, उनके क्रांतिकारी विचारों और विश्वव्यापी प्रभाव के बारे में विस्तार से बताएगा।





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ओशो कौन थे? जीवन, दर्शन और अनकही कहानियाँ (A Detailed Guide)

आधुनिक युग के सबसे प्रभावशाली और विवादास्पद आध्यात्मिक गुरुओं में से एक, ओशो (Osho), जिन्हें 'भगवान श्री रजनीश' और 'आचार्य रजनीश' के नाम से भी जाना जाता है, एक ऐसे व्यक्तित्व थे जिन्होंने धर्म, प्रेम, और ध्यान की पारंपरिक परिभाषाओं को पूरी तरह बदल दिया।

1. प्रारंभिक जीवन और शिक्षा (Early Life)

ओशो का जन्म 11 दिसंबर 1931 को मध्य प्रदेश के रायसेन जिले के कुचवाड़ा गाँव में हुआ था। उनका मूल नाम चन्द्र मोहन जैन था।

  • बचपन: ओशो अपने नाना-नानी के साथ रहे, जहाँ उन्हें पूर्ण स्वतंत्रता मिली। उनके नाना ने उन्हें कभी किसी सामाजिक या धार्मिक बंधन में नहीं बांधा।
  • शिक्षा: उन्होंने जबलपुर विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र में स्नातक और सागर विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर (MA) किया।
  • प्रोफेसर के रूप में: वे जबलपुर विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर रहे, लेकिन उनके विद्रोही विचारों के कारण वे अक्सर चर्चा में रहते थे।

ओशो (रजनीश) के प्रारंभिक जीवन और शिक्षा का कालखंड उनके क्रांतिकारी विचारों की नींव रखने वाला समय था। यहाँ उनके शुरुआती वर्षों का विस्तृत विवरण दिया गया है:


1. जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि

ओशो का जन्म 11 दिसंबर 1931 को मध्य प्रदेश के रायसेन जिले के एक छोटे से गाँव कुचवाड़ा में हुआ था। उनका जन्म एक 'तारणपंथी' जैन परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम बाबूलाल और माता का नाम सरस्वती जैन था। वे अपने ग्यारह भाई-बहनों में सबसे बड़े थे।

नाना-नानी का प्रभाव

ओशो के जीवन के शुरुआती सात साल उनके नाना-नानी के पास बीते। यह उनके व्यक्तित्व के निर्माण का सबसे महत्वपूर्ण समय था। उनके नाना ने उन्हें पूर्ण स्वतंत्रता दी और उन पर किसी भी प्रकार का अनुशासन या धार्मिक विश्वास नहीं थोपा।

  • ओशो अक्सर कहते थे कि उनके नाना की दी हुई वह स्वतंत्रता ही उनके बाद के जीवन में 'विद्रोही' बनने का कारण बनी।
  • जब उनके नाना का देहांत हुआ, तो उस घटना ने ओशो के मन में मृत्यु और जीवन के गहरे अर्थों को जानने की जिज्ञासा पैदा कर दी।

2. शिक्षा: एक प्रखर विद्यार्थी

ओशो बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के थे, लेकिन वे एक 'आदर्श' विद्यार्थी नहीं थे। वे शिक्षकों से कठिन और तर्कपूर्ण प्रश्न पूछते थे, जिससे अक्सर स्कूल में विवाद की स्थिति बन जाती थी।

उच्च शिक्षा (College & University)

  • जबलपुर: उन्होंने अपनी प्रारंभिक कॉलेज शिक्षा जबलपुर में प्राप्त की। यहाँ भी उनके विद्रोही स्वभाव के कारण उन्हें एक कॉलेज से दूसरे कॉलेज में स्थानांतरित होना पड़ा।
  • दर्शनशास्त्र (Philosophy): उन्होंने डी.एन. जैन कॉलेज से दर्शनशास्त्र में स्नातक (B.A.) किया।
  • स्वर्ण पदक (Gold Medalist): 1957 में, उन्होंने सागर विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र में स्नातकोत्तर (M.A.) की डिग्री प्राप्त की। वे अपने बैच के टॉपर थे और उन्हें स्वर्ण पदक से सम्मानित किया गया था।

3. वाद-विवाद और तर्क की शक्ति

छात्र जीवन के दौरान, ओशो एक असाधारण वक्ता (Debater) के रूप में उभरे। वे पूरे भारत में होने वाली वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में भाग लेते थे और लगभग हर बार विजेता बनकर लौटते थे। उनके तर्क इतने सटीक होते थे कि बड़े-बड़े विद्वान भी उनके सामने निरुत्तर हो जाते थे।

एक रोचक तथ्य: ओशो केवल दर्शनशास्त्र ही नहीं, बल्कि मनोविज्ञान, साहित्य और धर्म के भी गहन पाठक थे। उन्होंने अपनी युवावस्था में हजारों किताबें पढ़ीं, जो बाद में उनके विस्तृत प्रवचनों का आधार बनीं।


4. प्रोफेसर के रूप में करियर

अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद, उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में कदम रखा:

  1. रायपुर संस्कृत कॉलेज: उन्होंने यहाँ कुछ समय के लिए अध्यापन कार्य किया, लेकिन उनके विचारों को 'खतरनाक' मानकर कॉलेज प्रबंधन ने उन्हें हटा दिया।
  2. जबलपुर विश्वविद्यालय: बाद में, वे जबलपुर विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर नियुक्त हुए। यहाँ वे "आचार्य रजनीश" के नाम से लोकप्रिय हुए।

वे नौ वर्षों तक प्रोफेसर रहे। इस दौरान उन्होंने पूरे भारत की यात्रा की और गांधीवाद, समाजवाद और संगठित धर्मों की जमकर आलोचना की, जिससे वे पूरे देश में चर्चा का विषय बन गए।

2. 'संबोधि' (Enlightenment) का अनुभव

ओशो के अनुसार, 21 मार्च 1953 को 21 वर्ष की आयु में उन्हें जबलपुर के भंवरताल पार्क में एक मौलश्री वृक्ष के नीचे 'संबोधि' यानी आत्मज्ञान प्राप्त हुआ। उन्होंने इसे एक "महान मृत्यु" और "नया जन्म" बताया, जहाँ अहंकार पूरी तरह मिट गया और वे शून्य से भर गए।

ओशो के जीवन में 'संबोधि' (Enlightenment) की घटना वह क्षण था, जिसने 'चन्द्र मोहन' को 'ब्रह्मांडीय चेतना' से जोड़ दिया। ओशो ने अपनी कई पुस्तकों और प्रवचनों में इस रहस्यमयी अनुभव का बहुत ही सुंदर और विस्तृत वर्णन किया है।


संबोधि का क्षण: 21 मार्च 1953

ओशो के अनुसार, यह घटना तब घटी जब वे केवल 21 वर्ष के थे और जबलपुर में अपनी पढ़ाई कर रहे थे। उन्होंने बताया कि उस रात कुछ ऐसा हुआ जिसने उनके पुराने 'मैं' (अहंकार) को हमेशा के लिए मिटा दिया।

1. सात दिनों का संघर्ष

संबोधि प्राप्त होने से पहले के सात दिन ओशो के लिए बहुत भारी थे। उन्होंने बताया कि वे एक अजीब से मानसिक दबाव और शून्य से गुजर रहे थे। उन्हें ऐसा लग रहा था जैसे वे मरने वाले हैं। वे सो पा रहे थे, कुछ खा पा रहे थे। वे बस घंटों मौन बैठे रहते थे।

2. वह ऐतिहासिक रात

21 मार्च 1953 की रात, लगभग रात के एक बजे, ओशो को महसूस हुआ कि उनके कमरे की दीवारें गायब हो रही हैं और वे प्रकाश से घिर गए हैं। वे अपने कमरे से बाहर निकलकर पास के भंवरताल पार्क की ओर भागे।

"उस रात मैं पहली बार अपनी देह से अलग हुआ। मैंने देखा कि मेरा शरीर वहां पड़ा है और मैं दूर से उसे देख रहा हूँ। वह एक महान विस्फोट थाजैसे हजारों सूरज एक साथ उग आए हों।"

3. मौलश्री वृक्ष के नीचे

पार्क में एक मौलश्री (Maulshree) का पेड़ था। ओशो उसी पेड़ के नीचे बैठ गए। वहीं उन्हें उस परम शांति और आनंद का अनुभव हुआ जिसे बुद्ध, लाओत्सु और कृष्ण ने प्राप्त किया था। ओशो ने कहा कि उस रात के बाद वे कभी पहले जैसे नहीं रहे; 'रजनीश' मर चुका था और एक 'नई चेतना' ने जन्म लिया था।


संबोधि के बाद के बदलाव

ओशो ने इस अनुभव के बाद के कुछ प्रमुख पहलुओं को साझा किया:

  • अहंकार की मृत्यु: उन्होंने महसूस किया कि 'मैं' जैसा कुछ भी नहीं बचा है। अब केवल अस्तित्व (Existence) बोल रहा था।
  • समय का रुक जाना: उनके लिए समय और दूरी के मायने खत्म हो गए। उन्हें लगा कि सब कुछ 'अभी और यहीं' (Here and Now) है।
  • मौन और शब्दों का मेल: संबोधि के बाद वे कई वर्षों तक लगभग मौन रहे, और जब बोलना शुरू किया, तो उनके शब्द सीधे लोगों के दिलों को छूने लगे।

संबोधि पर ओशो का दृष्टिकोण

ओशो का मानना था कि संबोधि कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसे 'हासिल' किया जाए, बल्कि यह हमारी स्वाभाविक अवस्था है। हम बस इसे भूल गए हैं।

  • प्रयासहीनता: उन्होंने कहा कि जब आप पूरी तरह से शांत और विचारशून्य होते हैं, तब संबोधि अपने आप घटती है।
  • स्वयं की खोज: उनके अनुसार, "स्वयं को जानना ही एकमात्र धर्म है।"

अगला कदम: ओशो के क्रांतिकारी विचार

संबोधि के बाद ही ओशो ने दुनिया को 'सक्रिय ध्यान' (Dynamic Meditation) और 'सम्भोग से समाधि की ओर' जैसे क्रांतिकारी विचार दिए।

 

3. ओशो का दर्शन: मुख्य विचार (Core Philosophy)

ओशो का दर्शन किसी एक धर्म तक सीमित नहीं था। उन्होंने बुद्ध, कबीर, कृष्ण, ईसा मसीह और सूफी संतों पर हजारों प्रवचन दिए।

प्रमुख शिक्षाएं:

  • ध्यान (Meditation): उन्होंने पारंपरिक 'मौन ध्यान' के बजाय 'सक्रिय ध्यान' (Dynamic Meditation) की शुरुआत की। उनका मानना था कि आधुनिक मनुष्य तनाव से इतना भरा है कि वह सीधे शांत नहीं बैठ सकता; उसे पहले अपनी भावनाओं का रेचन (Catharsis) करना होगा।
  • प्रेम और काम (Sex to Superconsciousness): उनकी सबसे चर्चित और विवादास्पद पुस्तक 'सम्भोग से समाधि की ओर' (From Sex to Superconsciousness) थी। उन्होंने कहा कि कामवासना को दबाने के बजाय उसे स्वीकार कर ध्यान के माध्यम से रूपांतरित करना चाहिए।
  • ज़ोरबा बुद्धा (Zorba the Buddha): ओशो एक ऐसे मनुष्य की कल्पना करते थे जो भौतिक जगत का आनंद भी ले (ज़ोरबा की तरह) और भीतर से शांत भी हो (बुद्ध की तरह)

ओशो का दर्शन किसी एक धर्म, शास्त्र या संप्रदाय की सीमाओं में बंधा हुआ नहीं था। उन्होंने दुनिया के लगभग सभी महान धर्मगुरुओं और विचारकों पर बात की, लेकिन उनका अपना संदेश हमेशा 'व्यक्तिगत स्वतंत्रता' और 'जागरूकता' पर आधारित रहा।

यहाँ ओशो के दर्शन के मुख्य स्तंभों का विस्तृत विवरण दिया गया है:


1. ध्यान (Meditation): केवल मौन नहीं, उत्सव

ओशो ने ध्यान की पारंपरिक परिभाषा बदल दी। उन्होंने कहा कि आधुनिक मनुष्य के भीतर इतना मानसिक शोर और तनाव है कि वह सीधे शांत होकर नहीं बैठ सकता।

  • सक्रिय ध्यान (Dynamic Meditation): यह ओशो की सबसे प्रसिद्ध देन है। इसमें तेजी से सांस लेना, चिल्लाना (रेचन), कूदना और फिर शांत हो जाना शामिल है। उनका मानना था कि जब तक कचरा बाहर नहीं निकलेगा, शांति भीतर नहीं आएगी।
  • साक्षी भाव (Witnessing): ओशो के अनुसार ध्यान का अर्थ हैअपने विचारों और भावनाओं को बिना किसी निर्णय के केवल देखना। जैसे आप सड़क पर चलते ट्रैफिक को किनारे खड़े होकर देखते हैं।

2. 'ज़ोरबा बुद्धा' (Zorba the Buddha)

यह ओशो का सबसे प्रिय दर्शन था। वे एक ऐसे 'नूतन मनुष्य' (New Man) का निर्माण करना चाहते थे जो दो विपरीत ध्रुवों का मिलन हो:

  • ज़ोरबा: जो इस संसार के भौतिक सुखों, भोजन, नृत्य और प्रेम का भरपूर आनंद ले।
  • बुद्ध: जो भीतर से पूरी तरह शांत, मौन और जागरूक हो।

ओशो का मानना था कि पिछला मनुष्य या तो बहुत भौतिकवादी (पश्चिमी सभ्यता) रहा या बहुत आध्यात्मिक/त्यागी (पूर्वी सभ्यता) "ज़ोरबा बुद्धा" इन दोनों का संतुलन है।


3. प्रेम और काम (From Sex to Superconsciousness)

ओशो की पुस्तक "सम्भोग से समाधि की ओर" ने पूरी दुनिया में तहलका मचा दिया था। उनके विचार इस विषय पर बहुत स्पष्ट थे:

  • स्वीकारभाव: उन्होंने कहा कि कामवासना (Sex) प्राकृतिक है। इसे दबाने या इससे नफरत करने से मनुष्य विक्षिप्त हो जाता है।
  • रूपांतरण: यदि कामवासना को ध्यान और प्रेम के साथ जिया जाए, तो वही ऊर्जा 'समाधि' का द्वार बन सकती है। प्रेम को वे कामवासना का परिष्कृत रूप और ध्यान को प्रेम का अंतिम शिखर मानते थे।

4. संगठित धर्म का विरोध

ओशो ने हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, या किसी भी 'संगठित धर्म' (Organized Religion) को मानवता के लिए खतरनाक बताया।

  • वे कहते थे कि "धर्म" एक व्यक्तिगत अनुभव है, कि कोई भीड़ का हिस्सा होना।
  • उन्होंने पुजारियों और पंडितों की कड़ी आलोचना की क्योंकि उनका मानना था कि वे लोगों के मन में डर और अपराधबोध (Guilt) पैदा करते हैं।

5. मृत्यु: एक महान उत्सव

ओशो के दर्शन में मृत्यु का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। वे मृत्यु को जीवन का अंत नहीं, बल्कि 'परम विश्राम' और 'अंतिम अनुभव' मानते थे।

"यदि आपने जीवन को जागरूकता के साथ जिया है, तो आप मृत्यु का भी स्वागत एक उत्सव की तरह कर पाएंगे।"


6. स्वतंत्रता और जिम्मेदारी

ओशो के अनुसार, स्वतंत्रता का अर्थ स्वच्छंदता नहीं है। वे कहते थे कि आप जितने स्वतंत्र होंगे, आप उतने ही अधिक अपने प्रति जिम्मेदार होंगे। वे किसी भी प्रकार की मानसिक गुलामी या परंपराओं के अंधानुकरण के सख्त खिलाफ थे।

विषय

ओशो का दृष्टिकोण

ईश्वर

कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि एक 'अनुभव' (Godliness)

शिक्षा

केवल जानकारी नहीं, बल्कि 'बोध' विकसित करना।

परिवार

एक बंधन, यदि वह प्रेम के बजाय स्वामित्व पर टिका हो।

कला

ध्यान का ही एक रूप।


अगला कदम: रजनीशपुरम का उदय और पतन

 

4. पुणे आश्रम और अमेरिका का सफ़र

1974 में ओशो पुणे के कोरेगांव पार्क में आकर बस गए, जहाँ उनका आश्रम एक वैश्विक आकर्षण बन गया। 1981 में, वे अमेरिका चले गए जहाँ ओरेगॉन में 'रजनीशपुरम' नाम का एक पूरा शहर बसाया गया।

स्थान

महत्वपूर्ण घटना

पुणे (1974-81)

'नव-संन्यास' की शुरुआत और हज़ारों विदेशी शिष्यों का आगमन।

अमेरिका (1981-85)

64,000 एकड़ में रजनीशपुरम शहर का निर्माण और रॉल्स रॉयस का विवाद।

पुणे वापसी (1987-90)

अमेरिका से निर्वासन के बाद पुणे लौटे और 'ओशो' नाम अपनाया।

 

ओशो का जीवन दो बड़े केंद्रों के इर्द-गिर्द घूमा: पुणे (भारत) और ओरेगॉन (अमेरिका) इन दोनों जगहों पर उन्होंने जो साम्राज्य खड़ा किया, वह अध्यात्म के इतिहास में भूतो भविष्यति जैसा था।


1. पुणे आश्रम का स्वर्ण युग (1974-1981)

1974 में ओशो मुंबई से पुणे के कोरेगांव पार्क में स्थानांतरित हो गए। यहाँ उन्होंने 'श्री रजनीश आश्रम' की स्थापना की।

  • वैश्विक आकर्षण: यह वह समय था जब पश्चिम के पढ़े-लिखे लोग (डॉक्टर, इंजीनियर, मनोवैज्ञानिक) शांति की तलाश में पुणे खिंचे चले आए। आश्रम में भगवा वस्त्र और 'माला' पहने विदेशी शिष्यों की बाढ़ गई।
  • थेरेपी और ध्यान: यहाँ ओशो ने पूर्वी ध्यान विधियों को पश्चिमी मनोविज्ञान (Psychotherapy) के साथ जोड़ा। 'एनकाउंटर ग्रुप्स' और 'सूफी डांस' जैसे प्रयोग यहाँ आम थे।
  • विवाद: स्थानीय लोगों और सरकार के साथ विवाद भी यहीं शुरू हुए। ओशो के खुले विचारों और 'मुक्त प्रेम' (Free Love) की धारणा ने रूढ़िवादी समाज को नाराज कर दिया।

2. अमेरिका का सफ़र: 'रजनीशपुरम' का सपना (1981-1985)

1981 में स्वास्थ्य कारणों और भारत सरकार के साथ बढ़ते तनाव के बीच ओशो अचानक अमेरिका चले गए। उनकी सचिव माँ आनंद शीला ने ओरेगॉन के रेगिस्तानी इलाके में 64,000 एकड़ की एक विशाल ज़मीन खरीदी।

एक आधुनिक शहर का निर्माण

देखते ही देखते वहां 'रजनीशपुरम' नाम का एक हाई-टेक शहर बस गया, जिसमें:

  • अपना हवाई अड्डा (Air Strip), अस्पताल, और स्कूल थे।
  • हज़ारों शिष्यों के रहने के लिए आधुनिक टाउनहाउस थे।
  • हज़ारों एकड़ में खेती और खुद का बांध (Dam) बनाया गया।

रॉल्स रॉयस और ठाट-बाट

यहीं पर ओशो के पास 93 रॉल्स रॉयस कारों का बेड़ा इकट्ठा हुआ। वे हर सुबह अपनी कार में बैठकर अपने शिष्यों को दर्शन देते थे, जो सड़क के दोनों ओर खड़े होकर उन पर फूल बरसाते थे। ओशो का कहना था कि वे गरीबी की पूजा नहीं करते, बल्कि वैभव और अध्यात्म के मिलन के पक्षधर हैं।


3. पतन और निर्वासन (The Fall)

रजनीशपुरम की सफलता ही उसके पतन का कारण बनी। स्थानीय अमेरिकी निवासी (Antelopes) और ओरेगॉन की सरकार इस "विदेशी पंथ" के बढ़ते प्रभाव से डर गई।

  1. माँ आनंद शीला की भूमिका: ओशो लंबे समय तक मौन रहे, और सारा कामकाज शीला संभालती थी। शीला और उसके गुट पर सत्ता के लालच में स्थानीय लोगों को जहर देने (Bio-terror attack) और ओशो के निजी डॉक्टर की हत्या की साजिश रचने के आरोप लगे।
  2. गिरफ्तारी: 1985 में ओशो को आप्रवास कानूनों (Immigration laws) के उल्लंघन के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें जेल में रखा गया और बाद में अमेरिका से निर्वासित (Deport) कर दिया गया।
  3. 21 देशों से प्रतिबंध: अमेरिका छोड़ने के बाद ओशो ने दुनिया के कई देशों में शरण लेने की कोशिश की, लेकिन अमेरिकी दबाव के कारण 21 देशों ने उनके प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया।

4. पुणे वापसी (1987-1990)

अंततः ओशो 1987 में वापस पुणे लौटे। अब उन्होंने 'भगवान' शब्द त्याग दिया और 'ओशो' नाम अपनाया (जो जापानी शब्द 'ओशनिक' या 'शिक्षक' से प्रेरित है)

  • ओशो मल्टीवर्सिटी: उन्होंने आश्रम को एक 'मल्टीवर्सिटी' के रूप में पुनर्गठित किया।
  • अंतिम संदेश: अपने अंतिम दिनों में उन्होंने 'जेन' (Zen) पर अद्भुत प्रवचन दिए। उन्होंने 19 जनवरी 1990 को अपनी देह त्याग दी।

 

5. विवाद और चुनौतियाँ (Controversies)

ओशो का जीवन विवादों से अछूता नहीं रहा:

  1. पूँजीवाद का समर्थन: वे गरीबी की पूजा के खिलाफ थे और अमीरों के गुरु कहे जाते थे। उनके पास 90 से अधिक रॉल्स रॉयस कारें थीं।
  2. अमेरिकी सरकार से टकराव: रजनीशपुरम में बायो-टेररिज्म के आरोपों और उनकी सचिव 'माँ आनंद शीला' के कार्यों के कारण उन्हें अमेरिका छोड़ना पड़ा।
  3. धार्मिक आलोचना: पारंपरिक हिंदू, मुस्लिम और ईसाई गुरुओं ने उनकी कट्टर आलोचना की क्योंकि वे संगठित धर्मों को "मानवता का शोषक" मानते थे।

ओशो का जीवन जितना प्रकाशवान था, उतना ही विवादों के घेरे में भी रहा। वे शायद इतिहास के अकेले ऐसे आध्यात्मिक गुरु थे जिन्होंने जानबूझकर विवादों को न्योता दिया ताकि लोगों की सोई हुई चेतना को झकझोरा जा सके।

यहाँ ओशो से जुड़े प्रमुख विवादों और चुनौतियों का विस्तृत विवरण दिया गया है:


1. 'सम्भोग से समाधि की ओर' (The Sex Guru)

ओशो पर लगा सबसे पहला और सबसे बड़ा लेबल 'सेक्स गुरु' का था।

  • कारण: उन्होंने कामवासना (Sex) को दबाने के बजाय उसे स्वीकार करने और उसे ध्यान के माध्यम से रूपांतरित करने की बात कही।
  • विवाद: तत्कालीन भारतीय समाज और धार्मिक नेताओं ने इसे अनैतिक माना। ओशो का तर्क था कि समाज सेक्स को लेकर 'पाखंडी' है और दमन ही मानसिक रोगों की जड़ है।

2. रजनीशपुरम और बायो-टेरर अटैक (1984)

यह ओशो के जीवन का सबसे काला अध्याय माना जाता है। अमेरिका के ओरेगॉन में रजनीशपुरम के निर्माण के दौरान स्थानीय अधिकारियों के साथ संघर्ष चरम पर पहुँच गया।

  • साल्मोनेला हमला: 1984 में, ओशो की निजी सचिव माँ आनंद शीला और उनके गुट पर आरोप लगा कि उन्होंने स्थानीय चुनाव जीतने के लिए एक शहर के सलाद बार (Salad Bars) में 'साल्मोनेला' बैक्टीरिया मिला दिया ताकि लोग बीमार पड़ जाएं और वोट दे सकें। यह अमेरिका के इतिहास का पहला 'बायो-टेरर' हमला माना जाता है।
  • हत्या की साजिश: शीला पर ओशो के निजी चिकित्सक और अमेरिकी अधिकारियों की हत्या की साजिश रचने का भी आरोप लगा।

3. 93 रॉल्स रॉयस का बेड़ा

ओशो की विलासिता हमेशा चर्चा का विषय रही। उनके पास 93 रॉल्स रॉयस कारें थीं।

  • आलोचना: लोगों का कहना था कि एक आध्यात्मिक गुरु को इतना वैभव शोभा नहीं देता।
  • ओशो का जवाब: उन्होंने कहा कि वे "गरीबी के अध्यात्म" को खत्म करना चाहते हैं। वे दिखाना चाहते थे कि भौतिक संपन्नता और आत्मिक शांति साथ-साथ चल सकते हैं। उन्होंने चुटकी लेते हुए कहा था, "मैं उन पाखंडी गुरुओं की तरह नहीं हूँ जो बैलगाड़ी में चलते हैं और मन में हवाई जहाज़ का सपना देखते हैं।"

4. माँ आनंद शीला के साथ टकराव

ओशो और उनकी सचिव शीला के बीच का रिश्ता दुनिया के सबसे चर्चित 'पावर स्ट्रगल' में से एक है।

  • धोखाधड़ी का आरोप: 1985 में जब शीला अमेरिका छोड़कर भाग गई, तब ओशो ने मौन तोड़ा और उन पर करोड़ों डॉलर की धोखाधड़ी और रजनीशपुरम को 'फासीवादी' तरीके से चलाने का आरोप लगाया।
  • नेटफ्लिक्स डॉक्यू-सीरीज़: इस पूरे विवाद को हाल ही में नेटफ्लिक्स की प्रसिद्ध सीरीज 'Wild Wild Country' में विस्तार से दिखाया गया है।

5. जेल और 'धीमा जहर' (Slow Poisoning) का दावा

1985 में अमेरिकी सरकार ने ओशो को गिरफ्तार किया। ओशो और उनके अनुयायियों ने दावा किया कि अमेरिकी जेल में उन्हें थैलियम (Thallium) नामक धीमा जहर दिया गया था।

  • उनका कहना था कि उनकी गिरती सेहत और बाद में 1990 में हुई मृत्यु का मुख्य कारण यही जहर था। हालांकि, अमेरिकी सरकार ने इन आरोपों को हमेशा खारिज किया।

6. 21 देशों से निर्वासन

अमेरिका से निकाले जाने के बाद, ओशो एक 'अवांछित व्यक्ति' बन गए थे।

  • ग्रीस, इटली, स्विट्जरलैंड और जर्मनी सहित दुनिया के 21 देशों ने उन्हें अपने यहाँ रुकने की अनुमति नहीं दी।
  • कई देशों ने तो उनके विमान को उतरने तक नहीं दिया। यह दुनिया के इतिहास में किसी दार्शनिक के साथ हुआ सबसे अजीब बर्ताव था।

निष्कर्ष: विवादों के पार ओशो

इन तमाम विवादों के बावजूद, ओशो के अनुयायियों का मानना है कि ये सब उन्हें बदनाम करने की एक वैश्विक साजिश थी क्योंकि वे स्थापित सत्ताओं और धर्मों की नींव हिला रहे थे।

 

6. ओशो की मृत्यु और विरासत (Legacy)

19 जनवरी 1990 को पुणे में ओशो ने अपना शरीर छोड़ा। उनकी समाधि पर लिखा है:

" कभी जन्मे, कभी मरे, केवल 11 दिसंबर 1931 से 19 जनवरी 1990 के बीच इस ग्रह पृथ्वी का भ्रमण किया।"

आज भी, ओशो की 600 से अधिक पुस्तकें और हजारों घंटों के ऑडियो/वीडियो प्रवचन दुनिया भर में लाखों लोगों को प्रेरित कर रहे हैं। उनका पुणे स्थित 'ओशो इंटरनेशनल मेडिटेशन रिसॉर्ट' आज भी ध्यान प्रेमियों के लिए मक्का की तरह है।

 

ओशो के जीवन का अंतिम अध्याय उतना ही रहस्यमयी और शांत था, जितना कि उनका शेष जीवन तूफानी। उनकी मृत्यु और उसके बाद उनके विचारों के प्रसार ने उन्हें एक 'अमर दार्शनिक' की श्रेणी में खड़ा कर दिया है।


1. अंतिम समय और शरीर त्याग (19 जनवरी 1990)

1987 में पुणे लौटने के बाद ओशो का स्वास्थ्य लगातार गिर रहा था। उनके अनुयायियों का मानना है कि अमेरिकी जेल में दिए गए 'थैलियम' जहर के कारण उनका शरीर भीतर से कमजोर हो गया था।

  • अंतिम क्षण: 19 जनवरी 1990 को शाम 5:30 बजे, पुणे के आश्रम में ओशो ने अपना शरीर छोड़ा। उनके चिकित्सक के अनुसार, उनकी मृत्यु 'हृदय गति रुकने' (Heart Failure) के कारण हुई थी।
  • अंतिम संदेश: मरने से कुछ समय पहले जब उनके शिष्यों ने उनसे पूछा कि वे क्या करें, तो उन्होंने बस इतना कहा"मुझे अस्तित्व की विशालता में विलीन होने दो।"
  • उत्सव: ओशो की इच्छा के अनुसार, उनकी मृत्यु पर शोक नहीं मनाया गया। उनके शिष्यों ने नाचते-गाते और संगीत के साथ उनकी अंतिम विदाई दी।

2. ओशो की समाधि (The Samadhi)

पुणे के ओशो आश्रम में उनकी अस्थियों को एक सुंदर संगमरमर के हॉल में रखा गया है। उनकी समाधि पर कोई तारीख या जन्म-मृत्यु का विवरण नहीं है, बल्कि एक क्रांतिकारी संदेश लिखा है:

NEVER BORN, NEVER DIED Only Visited this Planet Earth between Dec 11, 1931 – Jan 19, 1990 ( कभी जन्मे, कभी मरे, केवल 11 दिसंबर 1931 से 19 जनवरी 1990 के बीच इस पृथ्वी ग्रह का भ्रमण किया)


3. ओशो की विरासत (The Legacy)

ओशो के जाने के बाद भी उनका प्रभाव कम होने के बजाय और बढ़ा है। उनकी विरासत के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:

पुस्तकों और ऑडियो का विशाल भंडार

ओशो ने खुद कभी कोई किताब नहीं लिखी। उन्होंने जो भी प्रवचन दिए, उन्हें उनके शिष्यों ने संकलित किया। आज उनकी 600 से अधिक पुस्तकें उपलब्ध हैं, जिनका दुनिया की 65 से अधिक भाषाओं में अनुवाद हो चुका है।

ओशो इंटरनेशनल मेडिटेशन रिसॉर्ट, पुणे

पुणे का वह आश्रम आज एक विश्व-स्तरीय मेडिटेशन रिसॉर्ट बन चुका है। यहाँ हर साल दुनिया के कोने-कोने से हजारों लोग ध्यान और शांति की तलाश में आते हैं। यह दुनिया के सबसे आधुनिक और भव्य आध्यात्मिक केंद्रों में से एक है।

ध्यान विधियों का वैश्विक प्रसार

ओशो की 'सक्रिय ध्यान' (Dynamic Meditation), 'कुंडलिनी ध्यान' और 'नादब्रह्म ध्यान' जैसी विधियाँ आज दुनिया भर के योग केंद्रों और मनोवैज्ञानिकों द्वारा उपयोग की जा रही हैं।

प्रसिद्ध हस्तियों पर प्रभाव

स्टीव जॉब्स (Apple के संस्थापक), लेडी गागा, और भारत के पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जैसे कई दिग्गजों ने ओशो के विचारों की सराहना की है। फिल्म जगत और कला के क्षेत्र में भी उनका गहरा प्रभाव है।


4. आज के समय में ओशो की प्रासंगिकता

आज के दौर में जब मानसिक तनाव, अवसाद (Depression) और अकेलेपन की समस्या बढ़ रही है, ओशो का दर्शन और अधिक प्रासंगिक हो गया है:

  • मानसिक स्वास्थ्य: उनकी 'रेचन' (Catharsis) तकनीक तनाव दूर करने में रामबाण मानी जाती है।
  • स्वतंत्र सोच: ओशो ने इंसान को भीड़ से अलग होकर अपनी 'मौलिकता' (Individuality) खोजने की प्रेरणा दी।
  • वर्तमान में जीना: उनका पूरा दर्शन 'अभी और यहीं' (Here and Now) पर टिका है।

निष्कर्ष

ओशो एक ऐसे व्यक्ति थे जिन्हें उनके जीवनकाल में समझा जाना बहुत कठिन था। वे एक 'भविष्यवक्ता' की तरह थे, जिन्होंने आने वाले समय की समस्याओं को पहले ही पहचान लिया था। भले ही वे शारीरिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके शब्द आज भी लाखों लोगों के जीवन में उजाला कर रहे हैं।

 

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